आगरा जनपद ने आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़ कर अपना योगदान दिया था। हमारा शहर 1928-29 के दौरान हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का भी केन्द्र रहा था जिसका कार्यालय नूरी दरवाजे पर था।

आगरा शहर में आज जहां संजय प्लेस स्थित है, वहां 1975 से पूर्व में केन्द्रीय कारागार था। इस केन्द्रीय कारागार में देश के कई जाने-माने स्वाधीनता सेनानीयों को ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने के जुर्म में कैद किया गया था। इस जेल से जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, योगेश चटर्जी, भूपेन्द्र नाथ सान्याल, मैथिलीशरण गुप्त, सेठ अचल सिंह और कृष्णदत्त पालीवाल जैसे सैनानीयों की यादें जुड़ी हुई हैं। संजय प्लेस स्थित शहीद स्मारक हमें उन जाने अनजाने स्वाधीनता सेनानीयों और क्रांतिकारियों की याद दिलाता है, जिनका संबन्ध आगरा से रहा है। यह शहीद स्मारक अगर न होता तो शायद आज की युवा पीढ़ी देश की आजादी में आगरा के योगदान से रूबरू न हो पाती।

23 मार्च 1980 को सरदार भगत सिंह के 50वें बलिदान दिवस पर शहीद स्मारक समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने सार्वजनिक घोषणा की थी कि संजय प्लेस में 200 वर्ग गज के प्लाॅट पर शहीद स्मारक बनाया जायेगा। इस स्मारक को बनवाने में 21 वर्ष लगे और यह फरवरी 2001 में बनकर तैयार हुआ। स्मारक के बेसमेंट में एक पुस्तकालय और शहीद दीर्धा है जिसका संचालन शहीद स्मारक समिति करती है। इस स्मारक को बनवाने का भागीरथ प्रयत्न जिस महापुरूष ने किया, वे थे ठाकुर राम सिंह जिनकी जन्मशती 11 अप्रैल, 2011 को आगरा में मनाई जा रही है।
ठा0 राम सिंह देश के सुविख्यात क्रांतिकारी थे जिनके सार्वजनिक जीवन का अधिकांश समय आगरा में बीता। उनका जन्म सौ साल पूर्व अजमेर (राजस्थान) के एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। बचपन में ही वे आजादी की लड़ाई से जुड़ गये थे। 28 जनवरी 1935 को अजमेर में बहुचर्चित डोगरा शूटिंग केस हुआ था जिसमें एक सीआईडी इंसपेक्टर डोगरा पर गोली चलाई गई थी। ठाकुर रामसिंह क्रांतिकारी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेने के जुर्म में सैल्युलर जेल, अण्डमान और फतेहगढ़ सैंट्रल जेल, उ0 प्र0 में लंबे समय तक सजा भुगतते रहे। आजादी के बाद उन्होंने आगरा जनपद को अपनी कर्मभूमि बनाया और फिर यहां रह कर जीवन पर्यन्त किसानों-मजदूरों के बीच काम करते रहें। उनके राजनैतिक जीवन की शुरूआत कांग्रेस पार्टी से हुई किन्तु बाद मे वे कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गये। जीवन के अंतिम 25 वर्षो में उन्होंने शहीदो की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये बनाये गये संगठन स0 भगत सिंह शहीद स्मारक, समिति, आगरा को अपना सारा समय सारा जीवन लगा दिया।

पहली बार ठा0 राम सिंह से मेरी मुलाकात 1970 में मथुरा में हुई जब मैं 10वी कक्षा का विद्यार्थी था। वे मथुरा में अपने मित्रों से मिलने आते थे जिनमे डा0 शिवशंकर उपाध्याय प्रमुख थे। उनकी घनी मूछों, कड़क आवाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व का मुझ पर गहरा असर हुआ क्योंकि मुझे यह मालुम था कि वे क्रांतिकारी आंदोलन के कारण अण्डमान में कालेपानी की सजा भुगत चुके हैं।

सन् 1977 से 1991 तक तक मुझे आगरा के राजा बलवंत सिंह कालेज में वाणिज्य संकाय में अध्यापन का अवसर मिला। मैं मदिया कटरा में किराये के मकान में रहता था। मैं 1980 में स0 भगत सिंह शहीद स्मारक समिति से जुड़ गया और संजय प्लेस में शहीद स्मारक बनाने की मुहिम में ठाकुर साहब के सहयोगी के रूप में काम करने लगा। ठा0 साहब किदवई पार्क, राजामण्ड़ी में रहते थे और पूरा दिन शहर के विभिन्न इलाकों में घूमते रहते थे। मेरे घर पर अक्सर वे सुबह 7-8 बजे आते थे और मेरी पत्नी को परंाठे बनाने की फरमाइश करते थे। नाश्ता करने के बाद उनका अगला मुकाम श्री डोरी लाल जी अग्रवाल का निवास स्थान होता था जो कि उनकी काफी मदद करते थे।

15 वर्षो के अपने आगरा कार्यकाल के दौरान मैंने ठा0 राम सिंह की शहीद स्मारक समिति द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित शहीद बलिदान दिवस (23 मार्च) कार्यक्रम में भाग लिया जो आमतौर नागरी प्रचारिणी पर आयोजित किया जाता था। ठा0 साहब ने अण्डमान जेल के स्वाधीनता सेनानीयों, नेवी विद्रोह और आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों, 1857 के गदर और अनेक ऐतिहासिक आन्दोलनों पर आगरा में बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जिस में देश के कोने-कोने से आजादी की लड़ाई के योद्धाओं को बुलाकर सम्मान किया जाता था। अक्सर इन कार्यक्रमों में विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं में भिड़न्त हो जाती थी ओर ठाकुर राम सिंह को बीच बचाव करना पड़ता था।

ठा0 राम सिंह ने घर नही बसाया क्योंकि क्रांतिकारी आन्दोलन में पार्टी इसकी इजाजत नहीं देती थी। किन्तु आगरा में उनका खानदान बहुत बड़ा था। बहुत सारे युवा और मध्यवर्गीय परिवार उनकी देखभाल में लगे रहते थे। मैं अक्सर सोचता था कि उनके व्यक्तित्व और आचरण में ऐसा क्या है कि बिना रक्त-संबन्ध के लोग उनका इतना सम्मान करते हैं। अक्सर अस्वस्थता या हड्डी टूटने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाता था, जहां उनके शिष्य और साथी उनकी देखभाल ऐसे करते थे जैसे कोई अपने सगे मां-बाप की करता होगा। मैंने कई लोगों से ठा0 राम सिंह के इस ‘बड़े परिवार’ का रहस्य जानने की कोशिश की। ज्यादातार लोगों को कहना था कि वे लोगों की विद्यार्थी जीवन से मदद करते थे और एक सगे बुजुर्ग की तरह स्नेह बांटते थे। उनका अपना क्रांतिकारी जीवन का इतिहास भी उनके व्यक्तित्व में आकर्षण पैदा करता था।

ठा0 साहब अपने शिष्यों और प्रशंसकों पर अमिट छाप छोड़ते थे। मै आगरा के अनेक डाक्टरों, वकीलो, शिक्षकों, किसानों, ट्रेड यूनियन, नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओ और पत्रकारों को जानता हूँ जिन्होंने सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों का समय-समय पर बड़ी सफलता से नेतृत्व किया है। वे अपने निजी जीवन में भी सामाजिकता को निभाते हैं। ठाकुर राम सिंह आगरावासियों की सामाजिक चेतना में सदैव एक बीज की तरह जीवित रहेंगे। ठाकुर साब, ये शहर सदा के लिये आप को याद रखेगा।