जौलाई-अगस्त के महीनों में देश के विश्वविद्यालयों और कालेजों के कैम्पसों में रौनक शुरू हो जाती है। शुरू के महिने एडमिशन की मारा मारी में निकल जाते है और फिर सिलसिला शुरू होता है आन्दोलनों का जिसमें शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थियों को अपनी-अपनी मांगों के लिये बारी-बारी से धरना, प्रदर्शन, जुलूस, घेराव और हड़तालें करनी पड़ती हैं। इन सबके बीच कक्षाऐं, शोध-अनुसंधान, सेमीनार, कांफ्रेंस, फैस्टीवल आदि भी इस तरह जारी रहते हैं जिसके बारे में सुप्रसिद्ध व्यंग्कार शरद जोशी ने ‘‘है भी नही भी’’ शीर्षक से अपना लेख लिखा था।

भारत के विश्वविद्यालयों व कालेजों में आज 1.6 करोड़ विद्यार्थी हैं जिनकी संख्या वर्ष 2020 तक 4.5 करोड़ होने की संभावना है। देश में उच्च शिक्षा पर वर्तमान में अनुमानतः ृ 46200 करोड़ खर्च होता है जिसके 2020 तक ृ 232500 करोड़ हो जाने की संभावना है। इसमें दो तिहाई भाग निजी क्षेत्र से और सिर्फ एक तिहाई भाग सरकार से आता है। भारत की उच्च शिक्षा का संचालन केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारें और नौ रेगूलेटरी संस्थाऐं मिलजुल कर करती है जिन्हें 527 विश्वविद्यालयों और लगभग 26000 कालेजों को नियंत्रित और नियमित करना होता है।

देश में उच्च शिक्षा के विशालतंत्र और भारी खर्च के बावजूद भी हन उन करोड़ो युवाओं की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं जो हर साल डिग्रीयां लेकर जाॅब मार्केट की कतारों में खड़े हो जाते है। करोड़ों डिग्रीधारियों की उम्मीदों और उनके मां-बाप के सपनों पर पानी फिर जाता है, जब उनमें से ज्यादातर को सम्मानजनक नौकरी नहीं मिलती है। ऊपर से यह ताना सुनने को मिलता है कि हमारे ग्रेजुएटों और पोस्ट ग्रेजुएटों में उद्योग-धंधों व कंपनियों के लिये जरूरी योग्यतायें, कौशल और ज्ञान का अभाव है।

वर्ष 2009 में यूपीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री बनने के बाद कपिल सिब्बल ने एक के बाद एक घोषणाएं करके देशवासियों में यह उम्मीद जगाई थी कि उच्च शिक्षा में भारी सुधार होने वाले हैं। ऐसा लगा कि यूनिवर्सिटियों और कालेजों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता, हेराफेरी और गैर जवाबदेही पर अंकुश लगेगा। कपिल सिब्बल के मानव संसाधन मंत्री बनने के बाद केन्द्र सरकार के अधीन चल रही रेगूलेटरी संस्थाओं में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार तो कुछ कम हुआ, किन्तु उच्च शिक्षा में व्यापक सुधारों के लिये कोई अपेक्षित उपलब्धियां नहीं दिखाई देती हैं। इसे मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की सफलता माना जाना चाहिये कि वे उच्च शिक्षा को हाशियों से निकाल कर सुर्खियों तक लाने मे सफल रहे, किन्तु हमारे कैम्पसों मे जमी हुई अकर्मण्यता की जंग और चहुं ओर फैली निराशा के कुहासे को दूर करने में वे अभी तक नाकामयाब रहे हैं।

यूपीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री पेशे से वकील हैं, तभी उच्च शिक्षा में सुधार की प्रक्रिया कई क्रांतिकारी बिलों को पारित करने की घोषणाओं से हुई। आजादी के बाद यूनिवर्सिटीयों और कालेजों के नियमन और नियंत्रण का जो ढांचा देश में खड़ा किया गया था वह कमोवेश इंग्लैंड की उच्च शिक्षा प्रणाली को ध्यान में रख कर ही तैयार किया गया था। 1947 में देश में 20 विश्वविद्यालय और सिर्फ 496 कालेज थे, जिनको आजादी के बाद ब्रिटिश माॅडल के अनुरूप चलाने में ज्यादा मुश्किलें नहीं आई।

पिछले दो वर्षो में मानव संसाधन मंत्रालय ने उच्च शिक्षा में बुनियादी परिवर्तन की अनेक घोषणाऐं की जिनमें बहुत से नये कानून बनाने के लिये संसद में अनेक बिलों को पारित कराना भी था। अब तक कपिल सिब्बल नौ नये बिलों को लाने की धोषणायें कर चुके हैं। इनमे से ज्यादातर को केन्द्रीय मंत्रीमण्डल द्वारा स्वीकृति मिल चुकी है किन्तु इन बिलों को संसद में पारित कराने में कुछ मुश्किलें आ रही है। 3 मई 2010 को संसद में जिन चार बिलों को पेश किया गया था, वे हैं (प) विदेशी शैक्षणिक संस्थान बिल 2010, (पप) तकनीकी, मेडीकल संस्थानों व विश्वविद्यालयों में अनुचित तरीकों के निषेध से सम्बन्धित बिल 2010, (पपप) शैक्षणिक ट्रिब्यूनल बिल, 2010 और (पअ) राष्ट्रीय एक्रिडिटेशन नियामक अथाॅरिटी बिल 2010।
इन चार बिलों में से पहले तीन बिलों को मानव संसाधन मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति के विचारार्थ भेजा गया था जो अभी इन पर शिक्षाविदों से चर्चा कर रही हैं। चैथे बिल शैक्षणिक ट्रिब्यूनल बिल को 2010 में लोकसभा ने पारित कर दिया था किन्तु राज्य सभा में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ सांसद और स्थायी समिति के सदस्य केशव राव के तीखे विरोध के कारण इसे वापस लेना पड़ा था। स्थायी समिति के सदस्यों का मत था कि उनके सुझावों को बिल में समाहित नहीं किया गया था। संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है किन्तु क्या उच्च शिक्षा में सुधार से सम्बन्धित ये चार या अन्य बिल संसद में पारित हो पायेंगे, ये अन्दाज लगाना मुश्किल है।

मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित 9 बिलों और दर्जनो घोषणाएं देश के मध्य वर्ग को लुभाने का काम भले ही कर पाएं किन्तु उच्च शिक्षा की बुनियादी समस्याओं का कोई कारगर हल नहीं देने जा रहीं। ये बुनियादी समस्याऐं है उच्च शिक्षा के अवसरों का सीमित रहना, वंचितों और गरीबों के लिये उच्च शिक्षा का पहुुंच से बाहर होना, गुणवत्ता और सार्थकता की कमी, पर्याप्त संसाधनों की अनुपलब्धता और उच्च शिक्षा के प्रबंध में केन्द्रीयकरण, गैर जवाबदेही और गैरभागीदारी का होना। कपिल सिब्बल कानून बना कर इन गंभीर समस्याओं को बुनियादी और कारगर हल निकाल पायेंगे, यह अभी तो मुश्किल लगता है।

भारत में उच्च शिक्षा सुधारों की रेलगाड़ी शताब्दी एक्सपै्रस की तरह तेजगति से चलेगी या पैसेंजर गति से, इसके कई आर्थिक और राजनैतिक कारण हैं। उच्च शिक्षा में बुनियादी बदलाव के लिये राष्ट्रीय स्तर पर जितनी बहस विभिन्न स्तरों पर होनी चाहियें थी वह सिर्फ मीडिया तक सीमित रही है। सभी बिलों को मंत्रालय की वैबसाइट पर डालने से ही राष्ट्रीय संवाद स्थापित नहीं होता। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा प्रस्तावित बिलों पर राजनैतिक दलों, राज्य सरकारों, शिक्षाविदों, नियोक्ताओं, शिक्षक व छात्र संगठनों के साथ संवाद स्थापित करके जिस राष्ट्रीय सहमति की जरूरत थी, उसका न होना इन सुधारों के टिकाऊपन पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। आज के दौर में भ्रष्टाचार को लेकर जो राजनैतिक घमासान चल रहा है, उसमें इन बिलों को संसद में पारित कराना टेड़ी खीर होगा। पिछले 2 वर्षो से न जाने कितने बिल ठंड़े बस्ते में पड़े हैं क्योंिक संसद का माहौल सामान्य और स्वस्थ नहीं है।

उच्च शिक्षा में सुधारों के बारे में केन्द्र सरकार की सोच बहुत सुस्पष्ट और सुविचारित नहीं हैं क्योंकि सब कुछ हडबड़ी और जल्दबाजी में करने की कोशिश की जा रही है। राज्य सरकारों को इसमे ज्यादा दिलचस्पी नहीं और औद्योगिक जगत को सिर्फ इतनी चिंता है कि उन्हंे अच्छे कर्मचारी कैसे मिलें। विश्वविद्यालय शिक्षकों व छात्रों के संगठनों ने भी उच्च शिक्षा सुधार में मुद्दों पर कोई बड़ी पहलकदमी नहीं की है।

मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर कोई नयी नीति लाने से पूर्व शिक्षाविदों के साथ बैठकर एक सर्वानुमति बनाने की परम्परा का पालन किया था। वर्तमान उच्च शिक्षा सुधारों केा प्रस्तावित करने और लागू कराने का सारा जिम्मा यदि चन्द नौकरशाहों पर छोड़ दिया जायेगा तो कोई बुनियादी परिवर्तन होने वाला नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनाना तो दूर की बात है अभी तो केन्द्रीय सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच भी राष्ट्रीय उच्च शिक्षा व अनुसंधान परिषद विधेयक 2010 के बारे में सहमति मुश्किल से बन पाती दिख रही है।

उच्च शिक्षा सुधारों को लेकर चल रही कशमकश और ऊहापोह का एक बुनियादी कारण केन्द्रीय सरकार की कथनी और करनी के बीच का बड़ा फर्क है। पिछले 64 वर्षो में हुए आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तनों ने समाज के हर वर्ग मंे उच्च शिक्षा को पाने के लिये एक ऐसी होड़ पैदा कर दी जिसे पूरा करने में हमारी उच्च शिक्षा का ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है। आज हमारे काॅलेज और विश्वविद्यालय, 21वीं सदी के लिये जरूरी ज्ञान, बुद्धि, संस्कृति, मानवीय गुण और जीविकोपार्जन विषयक योग्यताएं देना तो दूर सिर्फ कागज पर छपी डिग्रियां बांट रहे हैं। समुचित आर्थिक संसाधन न जुटा पाने के कारण केन्द्र व राज्य सरकारें निजी क्षेत्र को लगातार उच्च तकनीकी व पेशेवर शिक्षा में विस्तार की अनुमति देती रहीं। आज उच्च शिक्षा मे निजीक्षेत्र, सरकारी क्षेत्र से बहुत आगे निकल गया। सैद्धांतिक रूप से अधिकांश निजी संस्थान ‘नो प्रोफिट’ के सिद्धान्त का पालन करते हों, परन्तु उनमें एक बड़ा वर्ग विशुद्ध वाणिज्यिक उद्देश्य से काम करता है। निजी क्षेत्र में ऐसे भी बहुत से संस्थान हैं जो कि गुणवत्ता और रोजगार परकता पर खरे उतरते हैं। दूसरी और आईआईटी, आईआईएम और कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को छोड़कर ज्यादातर सरकारी कालेज और विश्वविद्यालय नौकरशाही और सरकारीकरण के फलस्वरूप सिर्फ घिसी पिटी लकीरों पर औसत दर्जे की उच्च शिक्षा देने में लगे हैं। उच्च शिक्षा में दूरगामी सुधारों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि केन्द्र व राज्य सरकारें, राजनैतिक दल, उद्योग जगत, शिक्षक व विद्यार्थी संगठन एक राष्ट्रीय सहमति के लिये प्रतिबद्धता दिखायें।