भारतीय शिक्षा में अब प्रवेश परीक्षाओं को ज्यादा अहमियत मिलने लगी है। यूपीएससी, कैट और जेईई जैसी प्रवेश परीक्षाओं में बैठने वाले अभ्यर्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उनकी तैयारी कराने वाली कोचिंग संस्थाएं काॅरपोरेट शैली में कार्य करने लगी हैं। देश के शीर्षस्थ प्रबंध-संस्थानों में दाखिले के लिये दरवाजे खोलने वाली काॅमन एडमिशन टैस्ट (कैट) परीक्षा 16 व 22 नवम्बर, 2014 को आयोजित हो चुकी है। इस बार की कैट परीक्षा में 1.70 लाख प्रवेशार्थी बैठे हैं, यद्यपि 1.97 लाख आवेदन पत्र पंजीकृत किये गये थे। कैट 2014 के संयोजक प्रो. रोहित कपूर (आईआईएम, इंदौर) के अनुसार इस माह (दिसंबर-2014) के तीसरे सप्ताह में कैट-2014 का परीक्षाफल घोषित कर दिया जायेगा।

कैट का परीक्षाफल घोषित होते ही एमबीए कोर्स में एडमिशन का सीजन शुरू हो जायेगा। कैट परीक्षा के माध्यम से 19 नये व पुराने आईआईएम तथा 89 निजी प्रबंध संस्थानों में दाखिला मिलता है। इन सभी संस्थानों में करीब 45000 सीटें है जिनमें आईआईएम की 4000 सीटें भी शामिल हैं। कैट के अलावा देश में कुछ और भी प्रवेश-परिक्षाएं जिनके द्वारा निजी व सरकारी प्रबंध संस्थान दाखिले करते हैं। ये अनुमन्य एमबीए प्रवेश परीक्षाएं हैं – ज़ैट, सीमैट, मैट, जीमैट एवं एटमा अगले दो-तीन माह में इन सभी प्रवेश परीक्षाओं के नतीजे घोषित हो जायेंगे।

अंदाज लगाया जाता है कि एमबीए एवं पीजीडीएम की 5 लाख सीटों के लिये करीब 10 लाख प्रवेशार्थी विभिन्न परीक्षाओं में अपना भाग्य आजमाते हैं। एमबीए कोर्स के माध्यम से एक सुनहरे कैरियर का सपना देखने वाले युवाओं के लिये आगामी कुछ महीने गहरे चिंतन, दुविधा और शंकाओं से परिपूर्ण होते हैं। लाखों मध्यवर्गीय परिवारों के लिये चिंता का विषय होता है कि क्या उनके बेटे या बेटी को किसी आईआईएम या शीर्षस्थ प्राईवेट बिजनेस स्कूल में दाखिला मिलेगा या नहीं? वर्ष 2008 में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के शुरू होने से पूर्व तक एमबीए डिग्रीधारियों को रोजगार के अवसरों की कमी नहीं थी। किन्तु 2009-13 के दौरान विश्वस्तर पर आर्थिक विकास की दर में गिरावट के फलस्वरूप रोजगार के अवसर सिकुड़ते चले गये। नतीजतन कंपनियों ने कैम्पस प्लेसमेंट में फूंक-फंूक कर कदम रखने की नीति पर चलना शुरू कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार के पिछले 6 महिनों के कार्यकाल में उद्योग जगत को यह उम्मीद जगी है कि अर्थव्यवस्था दिशा हीनता, अनिर्णय तथा भ्रष्टाचार के कीचड़ से निकल कर तेजी से विकास कर पायेगी। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं से विदेशी निवेशकर्ता भी उत्साहित हैं। पिछले कुछ महिनों में शेयर बाजार के साथ-साथ रोजगार के बाज़ार में भी तेजी आई है। फिर से भारतीय व विदेशी कंपनीयां बिजनेस स्कूलों में चक्कर लगा कर प्रतिभाशाली युवा एमबीए डिग्रीधारियों को जल्दी से जल्दी भर्ती करने की जुगाड़ में हैं। प्लेसमेंट का सीजन शुरू हो गया है किन्तु यह फरवरी-मार्च 2015 में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचेगा।

मानव संसाधन क्षेत्र की विदेशी कन्सलटेंसी फर्म मैनपाॅवर इंडिया ने अभी हाल में 5000 भारतीय नियोक्ताओं से सर्वेक्षण के माध्यम से पूछा कि जनवरी-मार्च 2015 में उनकी कंपनियां क्या पहले से अधिक भर्ती करेंगी या नहीं? इनमें से 44 प्रतिशत नियोक्ताओं को ज्यादा भर्तीयां करने की उम्मीद थी और सिर्फ 3 प्रतिशत नियोक्ता भर्ती में कमी की आशंका जता रहे थे। विश्वस्तर पर वर्ष 2015 के लिये भारत में शुद्ध रोजगार संभावना 45 प्रतिशत आंकी गई है जो कि ब्रिटेन में 7 प्रतिशत, चीन में 11 प्रतिशत और यूएसए मंे 16 प्रतिशत है। ये आंकड़े एक कंसलटेंसी फर्म की भविष्यवाणी हैं जो कि भारतीय राजनीति एवं अर्थव्यवस्था मंे स्थायित्व एवं प्रगति के प्रति आशावादी रूझान पर आधारित हैं।

इस बार प्लेसमंेट सीजन के अच्छे होने की तमाम संभावनाओं के बावजूद आँखमूंद कर किसी भी ऐरे-गैरे प्रबंध संस्थान में दाखिला लेने के दिन अब लद गये हैं। भारत के सभी 3900 प्रबंध संस्थान एक जैसे नहीं हैं। गहराई से देखा जाये तो नियोक्ताओं में अधिकांश प्रबंध संस्थानों के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं हैं। अभी हाल ही में एमबीए यूनीवर्स डाॅटकाॅम एवं ईपीएसआई ने ‘इंडियन मैनेजेमेंट एजूकेशन-विजन-2025’ के नाम से एक श्वेत-पत्र जारी कर मानव संसाधन मंत्रालय को सलाह दी है कि सभी प्रबंध संस्थानों को एक तराजू में न तौलंे।

इस श्वेत-पत्र के अनुसार 3900 प्रबंध संस्थानों मंे सिर्फ 50 ऐसे हैं जो कि 2025 तक विश्वस्तर पर पहचान बना सकते हैं। भारतीय प्रबंध शिक्षा के पिरामिड में मध्य-स्तर पर ऐसे 500 प्रबंध संस्थान है जो कि अगले 10 वर्षो में क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं। शेष 2000 प्रबंध संस्थानों को, जो कि एआईसीटीई की न्यूनतम शर्तों को बमुश्किल पूरा करते हैं, कौशल प्रशिक्षण की ओर मोड़ा जाता है। ये संस्थान रिटेल, रियलस्टेट, माइक्रो फाइनेंस, इंश्योरेंस, बैंकिंग, एग्रो-बिजनिस जैसे उभरते हुए क्षेत्रों में खास-तरह की प्रबंधकीय जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

विश्व में 15000 से अधिक प्रबंध संस्थान हैं जहाँ एमबीए की पढ़ाई होती है। इनमें से करीब 3900 संस्थान भारत में चलाये जा रहे हैं । भारत में मुख्य रूप से एमबीए व पीजीडीएम कार्यक्रम लोकप्रिय हैं। जिनमें फर्क इस बात का है कि 300 पीजीडीएम संस्थान विश्वविद्यालयों के शिकंजे से बाहर हैं। पीजीडीएम संस्थानों में सरकारी व निजी दोनांे तरह की संस्थाएं हैं। भारत सरकार द्वारा स्थापित 19 आईआईएम संस्थानों में अहमदाबाद, कोलकाता, बंगलुरू, लखनऊ, इंदौर व कोझीकोड के संस्थान लब्ध प्रतिष्ठित हैं जबकि 2-3 वर्ष पूर्व रोहतक, काशीपुर, उदयपुर, शिलांेग, रायपुर, रांची व त्रिचुरापल्ली में स्थापित 7 नये आईआईएम अभी अपनी पहचान व ब्राण्ड को स्थापित करने के लिये जद्दोजहद में हंै। एनडीए सरकार ने वर्ष 2014-15 के बजट में 6 नये आईआईएम स्थापित करने की घोषणा की थी। इनके प्रथम सत्र भी जुलाई 2015 में शुरू किये जाने की संभावना है।

एमबीए में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थियों एंव रोजगार देने वाली कंपनियांे के लिये यह मुश्किल होता है कि कैसे अच्छे और खराब प्रबंध संस्थानों की पहचान की जाये। एआईसीटीई अभी तक एमबीए संस्थानों को मान्यता देती रही है। भ्रष्टाचार, कुशासन एवं राजनैतिक हस्तक्षेप उच्चशिक्षा में हर जगह दिखाई देता है और एआईसीटीई भी उससे अछूती नहीं रही है। तकनीकी व प्रोफेशनल शिक्षा में 1990 और 2007 के बीच नये संस्थानों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी। इसका मुख्य कारण था भारत सरकार की उदारीकरण की नीति जिसमें प्राइवेट सेक्टर को तकनीकी शिक्षा में खुली छुट दी गई जिससे सरकार को अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल सके । उदारीकरण के प्रारंभिक 15 वर्षाें मेें भारतीय अर्थ व्यवस्था में तेजी का दौर था और कंपनियां बिजनेस स्कूलों में जमकर नौकरियां बांट रही थीं ।

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या एमबीए की चमक फीकी हो रही है और क्या भविष्य में एमबीए की डिग्री वाले युवाओं को अच्छी नौकरियाँ नहीं मिल पायेंगी? एमबीए डिग्रीधारियों को भर्ती करने वाली कंपनियांे एवं उनके उच्च प्रबंध की कई बार यह शिकायत रहती है कि भारतीय बिजनिस स्कूलों से निकलने वाले एमबीए डिग्रीधारी आज की व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करने और कंपनियों के कारोबार की दिन प्रतिदिन की समस्याओं का हल ढंूढने में असमर्थ हैं। राष्टीय स्तर पर किये गये कई सर्वेक्षणों में भी यह उभर कर आया हैं कि बमुश्किल 23 प्रतिशत एमबीए ही कम्पनियों में भर्ती किये जाने योग्य हैं। स्पष्ट है कि सिर्फ एमबीए की डिग्री औद्योगिक व व्यावसायिक जगत में सफलता की गारण्टी नहीं है।

हर भारतीय अभिभावक और उनकी युवापीढ़ी के मन में यह सवाल उठते हैं कि एमबीए करने से क्या फायदा होगा? क्या एमबीए की पढ़ाई पर जितना खर्च होगा, उतना कितने साल की नौकरी से वसूल हो पायेगा? क्या एमबीए करने के बाद सबको नौकरी मिल पायेगी? क्या स्नातक डिग्री पानेे के बाद सीधे एमबीए करना चाहिये या कुछ वर्ष कार्य-अनुभव पाने के बाद? एडमिशन लेने से पूर्व इन सवालों के जवाब लेना जरूरी है। आप यदि एमबीए मंे एडमिशन लेने जा रहे हैं तो जरा संभल के चालिये। भड़कीले विज्ञापनों, कोचिंग इंस्टीट्यूयों की सिफारिशों और बिजनेस स्कूलों की आकर्षक बिल्ड़िगों के मायाजाल में फंसने से बचें। हर चमकदार पीली धातु-सोना नहीं होती। हर बिजनिस स्कूल आप के कैरियर को सही दिशा नहीं दे सकता। हो सकता है कि कैट, मैट, सीमैट के आधार पर कई जगहों से आप को एडमिशन के आॅफर लैटर मिलें। आप को सोच समझकर चुनाव करना चाहिये। सबसे पहले तो स्थान का चुनाव करना चाहिये। भारतीय अर्थव्यवस्था में दिल्ली-एनसीआर, गुड़गावं, नोएडा, मुंबई, बंगलुरू, चण्ड़ीगढ़, पुने, हैदराबाद तथा चैन्नई ऐसे केन्द्र हैं जहां पर रोजगार के अवसर जयादा पैदा हो रहे हैं। इन शहरों के बिजनिस स्कूलों का उद्योग जगत से जुड़ाव लगातार बना रहता है जो प्रबंधशिक्षा की आधारभूत जरूरत है।

बिजनेस स्कूल की लोकेशन के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी है कि उसका प्रबंध कैसे लोगों के हाथों में हैं? क्या संस्थापक उद्योग-धन्धों से जुड़े ख्यातिप्राप्त उद्योगपति, उद्यमी, शिक्षाविद या पेशेवर लोग हैं अथवा ऐसे लोग जिनके लिये शिक्षा भी एक व्यवसाय है? स्पष्ट है कि दूसरी श्रेणी के संस्थापकों में जल्दी से जल्दी और नये संस्थान खोलने की होड़ लगी रहती है जो कि शिक्षा का एक तरह से व्यवसायीकरण ही कहा जायेगा। एमबीए में एडमिशन लेते समय फैक्ल्टी एवं अलुमनाई के बारे में भी जांच-पड़ताल करना उचित रहेगा। हर बिजनेस स्कूल को अपनी वैबसाइट पर फैक्लटी एवं अलुमनाई के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होती है। संस्थान के चालू बैचों में पढ़ रहे विद्यार्थियों से भी जानकारी लेनी चाहिये कि आखिर पढ़ाई लिखाई कैसी होती है।

आखिर में, जरा यह सोचिये कि आप की एमबीए डिग्री या पीजीडीएम का डिप्लोमा अगले 25-30 वर्षो तक यह निर्धारित करेगा कि आप भविष्य में क्या करेंगे और रोजगार के बाजार में आप की हैसियत क्या रहेगी? यह जरूरी नहीं कि आप जिंदगी भर नौकरी ही करें। आप खुद उद्यमी बन कर गूगल, फेसबुक, फ्लिपकार्ड, स्नैपडील, माइक्रोमैक्स और जोमैटो जैसी कंपनीयां बना कर शौहरत व दौलत कमा सकते हैं। यह तभी संभव होगा जब आप प्लेसमैंट से ज्यादा बिजनेस स्कूल से मिलने वाले ज्ञान, अनुभव, कौशल और सहपाठियों के नेटवर्क बनाने पर ध्यान दें। एमबीए कोर्स आप को ऊँचाईयों तक ले जा सकता है बशर्ते कि आप बहुत सोच-समझ कर फैसला लें।