लंबे इंतजार के बाद बहुचर्चित नालंदा विश्वविद्यालय का उद्घाटन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 20 सितंबर 2014 को करने जा रही हैं। ज्ञातव्य है कि 28 मार्च 2006 को बिहार विधानसभा को संबोधित करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने प्राचीन नालंदा महाविहार की पुर्नस्थापना के लिये देश का आव्हान किया था। डा. अब्दुल कलाम के इस विचार से उत्साहित होकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने नालंदा महाविहार के प्राचीन खण्डहरों से 12 किमी दूर स्थित राजगीर में 433 एकड़ भूमि इसके लिये आवंटित कर दी थी।

प्राचीन नालंदा महाविहार को दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी होने का गौरव प्राप्त था। इसकी स्थापना राजा सकरादित्य ने ई0 500 के आसपास वर्तमान पटना से लगभग 88 किमी दूरी पर स्थित नालंदा में की थी। दुनिया का प्राचीन विश्वविद्यालय 700 वर्षो तक फलता-फूलता रहा और इसमें पढ़ने-पढ़ाने के लिये चीन, कोरिया, जापान, मंगोलिया, तिब्बत, श्रीलंका, यूनान और फारस से विद्यार्थी और शिक्षक आते रहे। इस विश्वविद्यालय को गुप्त वंश के राजाओं और सम्राट हर्ष का भी खुला समर्थन प्राप्त था। यह विश्वविद्यालय जब अपने उत्कर्ष पर था तो इसमें 10 हजार विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिये 2000 अध्यापक थे। वर्ष 1193 में बख्तियार खिलजी की तुर्की सेना ने इसे नेस्त-नाबूद कर दिया था।

आज विश्वस्तर पर उच्चशिक्षा के क्षेत्र में आॅक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, पैरिस, हारवर्ड और एमआईटी जैसी यूनिवर्सिटियां का लोहा माना जाता है। इनमें आॅक्सफोर्ड वर्ष 1096 में, कैम्ब्रिज वर्ष 1209 में और पैरिस वर्ष 1096 में स्थापित हुई थीं। दुनिया की अन्य प्राचीनतम यूनिवर्सिटियों में अल कराउइन (मोरक्को) वर्ष 859 में, अल अज़हर (मिश्र) वर्ष 972 में और बोलोना (इटली) वर्ष 1088 में स्थापित हुई थीं। ये सभी यूनिवर्सिटियां अभी भी दम-खम के साथ चल रही हैं। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि दुनिया में 500 वर्ष पहले स्थापित तमाम संस्थाओं (जिनमें वैटिकन तथा ब्रिटिश संसद भी शामिल है) में सिर्फ 85 अभी भी चल रही हैं। इनमें 70 संस्थाएं पुराने विश्वविद्यालय है। बख्तियार खिलजी की सेनाओं ने वर्ष 1193 में नालंदा महाविहार को बरबाद नहीं किया होता तो आज उसे दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी कहलाने का गौरव प्राप्त होता।

नया नालंदा विश्वविद्यालय एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय होगा। वर्ष 2010 में संसद के दोनों सदनों द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय बिल पारित कर दिया गया था। प्रख्यात अर्थशास्त्री डा0 अमत्र्य सेन को इस विश्वविद्यालय का कुलाधिपति बनाया गया और वे इस के प्रबंध मण्डल के सभापति भी हैं। दरअसल डा. अमत्र्य सेन के इस की स्थापना से जुड़ने के बाद दुनिया के कई देशों की सरकारों ने इसे आर्थिक मदद देने की घोषणा की थी। 2009 में बैंकोक में हुए पूर्व एशिया सम्मेलन में 16 एशियाई देशांे ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना में सहयोग की घोषणा की थी। डा. सेन के अलावा कई और ख्याति प्राप्त व्यक्ति अपना समर्थन इसे दे चुके हैं। इनमें लार्ड मेघनाद देसाई (लंदन स्कूल आॅफ इकाॅनोमिक्स), प्रो. सुसमू नाकानिशी (क्योटो यूनि.), प्रो वांग बांगवेई (पेकिंग यूनि.), एन.के सिंह (सदस्य, राज्यसभा) और जाॅर्ज येओ (पूर्व विदेश मंत्री, सिंगापुर) के नाम प्रमुख हैं।

नये नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पर करीब रू. 2727 करोड़ खर्च होगा और इसके निर्माण में करीब 10 वर्ष लगेंगे। जापान और सिंगापुर निर्माण कार्य पर रू. 600 करोड़ विनियोग करेंगे। अनुमान लगाया जाता है कि प्रोजेक्ट को पूरा करने में लगभग रू. 3000 करोड़ खर्च होंगे और आस-पास के इलाके को विकसित करने पर अतिरिक्त रू. 3000 करोड़ खर्च करने होंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. गोपा सब्बरवाल को फरवरी 2011 मंे नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। 15 विद्यार्थियों के साथ नये नालंदा विश्वविद्यालय का प्रथम अकादमिक सत्र 1 सितंबर, 2014 को शुरू कर दिया गया है जो कि इतिहास विज्ञान तथा पर्यावरण जैसे विषयों मंे स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्ययन करेंगे।

फिलहाल नालंदा विश्वविद्यालय की कक्षाएं राजगीर के एक कन्वेंसन संेटर में लगाई जा रही हैं और विद्यार्थियों को एक अस्थाई होस्टल में टिकाया गया है। विद्यार्थियों से रू. 1.6 लाख की वार्षिक फीस ली जायेगी। अभी बिहार सरकार द्वारा दी गई जमीन पर सिर्फ बाउन्ड्री बन पाई है और अनुमान है कि प्रथम चरण का भवन निर्माण कार्य 2020 तक ही पूरा ही पायेगा।

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुर्नजीवित करने की डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और डा. अमत्र्य सेन की कल्पना भारतवासियों तथा समूचे पूर्वी एशिया के देशों को भले ही रोमांचित करती हो, किन्तु एक विश्वस्तरीय संस्थान को आठ वर्षो बाद भी सही तरीके से खड़ा न कर पाना हमारी समूची उच्च शिक्षा प्रणाली, नौकरशाही और राजनीति की कार्यक्षमता के ऊपर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है। बड़े अचरज की बात है कि अन्तर्राष्ट्रीय महत्व की इस परियोजना को अतिविशिष्ट व्यक्तियों, सरकारों व अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भरपूर समर्थन मिलने के बावजूद नालंदा विश्वविद्यालय की शुरूआत अत्यन्त साधारण एवं निराशाजनक ढंग से हो रही है।

क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिये कि उच्चशिक्षा में विश्वस्तर पर भारत की पहचान बनाने के लिये आईआईटी एवं आईआईएम के अलावा कोई और ब्राण्ड हमारे पास नहीं बन पाया? उच्च शिक्षा जगत के ये दोनों ब्राण्ड भी अपनी चमक-दमक धीरे धीरे खोते जा रहे हैं, क्योंकि इनोवेशन और उद्यमिता की वैश्विक दौड़ में हमारी रफ्तार बहुत तेज और विश्वसनीय नहीं दिखती।

नये नालंदा विश्वविद्यालय की फीकी शुरूआत से यह बात साफ जाहिर होती है कि कोई बड़ा काम करने के लिये हम रोमांचित और गौरवान्वित तो होते हैं किन्तु उस ‘बडे़ काम’ को साकार रूप देने की राष्ट्रीय इच्छा शक्ति और काबिलियत हमारे पास में नहीं है। केन्द्र, राज्य सरकारों, विदेशी दान दाताओं, मीडिया, बुद्धिजीवियों के विपुल समर्थन के बावजूद भी यदि हम एक शानदार कैम्पस नहीं बना पाये और पर्याप्त संख्या में देशी व विदेशी छात्र व शिक्षक नहीं जुटा पाये तो इसके लिये राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आत्म-विश्लेषण की जरूरत है। इससे यह भी उभर कर आता है कि एक विश्वस्तरीय परियोजना के समयबद्ध व सफल क्रियान्वयन के लिये जिस उच्चस्तरीय परियोजना प्रबन्ध, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना, जवाबदेही तथा निष्पादन प्रबंध की जरूरत होती है, वह शायद आमतौर पर हम जुटा नहीं पाते। क्या कारण है कि दिल्ली मैट्रो और मंगलयान जैसी महात्वाकांक्षी परियोजनाए समय पर पूरी हो जाती है, किन्तु नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर आठ वर्षांे में खड़ा नहीं हो पाता?

नये नालंदा विश्वविद्यालय के साथ अब वह ढीलढाल, नौकरशाही और खींचतान नहीं होनी चाहिये जो यूपीए-2 के कार्यकाल में कपिल सिब्बल द्वारा बहुप्रचारित 16 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 7 आईआईटी एवं 6 आईआईएम की स्थापना के साथ हुआ। राजनैतिक कारणों से दूर-दराज के ऐसे स्थानों पर ये राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किये जाने थे जहाँ पर उच्चशिक्षा के लिये जरूरी बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद नहीं था। ये संस्थान बिना कैम्पस को स्थापित किये हुए और शिक्षकों की पूरी भर्ती के बिना किसी भी 4-5 कमरों की पुरानी सरकारी बिल्डिंगांे में शुरू कर दिये गये। आईआईटी एवं आईआईएम जैसे राष्ट्रीय स्तर के अनेक नवस्थापित उच्चशिक्षा संस्थानों की मौजूदा हालत चिंताजनक है। कम से कम नालंदा विश्वविद्यालय का यह हश्र नहीं होना चाहिये।

नये नालंदा विश्वविद्यालय की परिकल्पना में नालंदा महाविहार के प्राचीन वैभव और वैश्वीकरण के इस दौर में भारत की उच्चशिक्षा, शोध व अनुसंधान सम्बन्धी जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। अभी हाल में प्रथम अकादमिक सत्र इतिहास तथा पर्यावरण विभागों से शुरू किया गया है। कालांतर में बौद्ध अध्ययन, दर्शनशास्त्र, तुलनात्मक धर्म, भाषा व साहित्य, अन्तर्राष्ट्रीय संबन्ध व विश्व शांति, सूचना विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, लोकनीति और विकास विषयक विभाग भी जोड़े जायेंगे। उम्मीद की जाती है कि उदारीकरण के दौरान पिछले दो दशकों में भारतीय विश्वविद्यालयों में मानविकी और समाज विज्ञान से जुडे़ विषयों जैसे भाषा, साहित्य, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान आदि के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध में जो कमी आई है, उसे नया नालंदा विश्वविद्यालय पूरा कर सकेगा।

भगवान बुद्ध और महावीर 5वीं और 6वीं ईस्वी में नालंदा पधारे थे। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय ने शीलभद्र, नागार्जुन, धर्मपाल, पद्मसंभव, धर्मकीर्ति और हुएन त्सांग जैसे प्रकाण्ड विद्वानों को पैदा किया था, जिनकी कीर्ति-पताका समूचे एशिया में फहराती थी। नये नालंदा विश्वविद्यालय से यह आशा की जाती है कि वह नालंदा के प्राचीन वैभव को फिर से पैदा कर पायेगा।