एमबीए में प्रवेश के लिये कैट की परीक्षा का परिणाम आते ही भारतीय मध्यवर्ग परिवारों में संशय और उद्विग्नता का माहौल शुरू हो जाता है। एमबीए में प्रवेश लेने का सपना देखने वाले लाखों अभ्यर्थियों के मां-बापों को यह चिंता सताती है कि उनके बेटे-बेटियों को किसी आईआईएम या अन्य शीर्षस्थ प्राईवेट बिजनिस स्कूल में सीट मिल पायेगी या नहीं। उनकी चिंता का मुख्य कारण है कि करीब 25,000 सीटों के लिये 1.90 लाख अभ्यर्थियों ने इस वर्ष परीक्षा दी है। शीर्ष संस्थानों में दाखिले के लिये उपलब्ध 25,000 सीटों में आईआईएम संस्थानों के पास 3500 और शेष सीटें प्राईवेट संस्थानों के पास हैं।

नये वर्ष के आगमन के साथ एमबीए के एडमिशन का सीजन शुरू हो चुका है। कैट, जेट, मैट व सीमेट की प्रवेश-परीक्षाओं के नतीजे आने वाले हैं। करीब दस लाख युवा हर वर्ष एमबीए की पाँच लाख सीटों के लिये इस उम्मीद के साथ प्रवेश परीक्षा देते हैं कि किसी नामी गिरामी प्रबंध संस्थान में उन्हे दाखिला मिल सके। वर्तमान भारत में एमबीए के पाठयक्रम 3500 बिजनेस स्कूलों व 600 यूनिवर्सिटियों में चलाये जा रहे हैं, किन्तु सभी जगह दाखिला लेने के लिये लंबी कतारंे नहीं लगती है।

दुनिया के हर देश में एमबीए के कोर्स बहुत लोकप्रिय माने जाते हैं। भारत में भी मध्य वर्ग का हर परिवार सपना देखता कि कैसे उनकी युवा पीढ़ी एमबीए करके किसी बड़ी कंपनी में मोटी तनख्वाह की नौकरी हासिल कर पाये। किन्तु प्रबंध शिक्षा और एमबीए के कोर्स को लेकर आजकल कई सवाल, शंकाएं और आलोचनाएं सुनने में आती हैं । मीडिया में भी एमबीए को लेकर अनेक निराशा जनक समाचार पढ़ने को मिलते रहते हंै। भारत में पिछले 5 वर्षों में 500 से अधिक प्रबंध संस्थानों पर ताला लग चुका है और हजारों अन्य संस्थानों में आधी से ज्यादा सीटें खाली रह जाती हैं। कई लोग मानते हंै कि भारत में ‘डाॅटकाॅम-बबल’ की तरह एमबीए का बबूला भी फूटने वाला है और अधिकांश चालू मार्का संस्थान बंद होने वाले हैं।

विश्व में 15000 से अधिक प्रबंध संस्थान हैं जहाँ एमबीए की पढ़ाई होती है । इनमें से करीब 4000 संस्थान भारत में चलाये जा रहे हैं । भारत में मुख्य रूप से एमबीए व पीजीडीएम कार्यक्रम लोकप्रिय है। जिनमें फर्क इस बात का है कि 300 पीजीडीएम संस्थान विश्वविद्यालयों के शिकंजे से बाहर हैं। पीजीडीएम संस्थानों में सरकारी व निजी दोनांे तरह की संस्थाएं हैं। भारत सरकार द्वारा स्थापित 13 आईआईएम संस्थानों में अहमदाबाद, कोलकाता, बंगलुरू, लखनऊ, इंदौर व कोझीकोड के संस्थान लब्ध प्रतिष्ठित हैं जबकि रोहतक, काशीपुर, उदयपुर, शिलांेग, रायपुर, रांची वत्रिचुरापल्ली में स्थापित 7 नये आईआईएम अभी अपनी पहचान व ब्राण्ड को स्थापित करने के लिये जद्दोजहद में हंै।

एमबीए में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थियों एंव रोजगार देने वाली कंपनियांे के लिये यह मुश्किल होता है कि कैसे अच्छे और खराब प्रबंध संस्थानों की पहचान की जाये। एआईसीटीई अभी तक एमबीए संस्थानों को मान्यता देती रही है। भ्रष्टाचार, कुशासन एवं राजनैतिक हस्तक्षेप उच्चशिक्षा में हर जगह दिखाई देता है और एआईसीटीई भी उससे अछूती नहीं रही है। तकनीकी व प्रोफेशनल शिक्षा में 1990 और 2007 के बीच नये संस्थानों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी। इसका मुख्य कारण था भारत सरकार की उदारीकरण की नीति जिसमें प्राइवेट सेक्टर को तकनीकी शिक्षा में खुली छुट दी गई जिससे सरकार को अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल सके । उदारीकरण के प्रारंभिक 15 वर्षाें मेें भारतीय अर्थ व्यवस्था में तेजी का दौर था और कंपनियां बिजनेस स्कूलों में जमकर नौकरियां बांट रही थीं ।

2007 के बाद अमरीकी अर्थव्यवस्था व यूरोप में आई बेतहाशा मंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी जकड़ लिया था और 2008 से 2012 के बीच में भारतीय व विदेशी कंपनियों ने बिजनेस स्कूलों में आंख मूंदकर नौकरियों को बांटना कम कर दिया। विश्वव्यापी मंदी का सबसे ज्यादा असर आईटी कंपनियों पर पड़ा जो कि लाखों एमबीए व इंजीनियरों को मोटी तनख्वाह पर भर्ती करती थीं। इसी मंदी के दौरान एआईसीटीई ने भ्रष्टाचार, राजनैतिक दबाव व अदूररर्शिता के फलस्वरूप एमबीए की सीटों को जोे कि 2007 में 94,704 थीं 2012 तक 3.85 लाख कर दिया । मंदी के 5 वर्षों में एमबीए की सीटों को एआईसीटीई द्वारा चार गुना करने का औचित्य आजतक किसी को समझ में नहीं आया । नतीजतन छोटे छोटे कस्बो ग्रामीण क्षेत्रांे, और सुदरवर्ती क्षेत्रों में एमबीए के संस्थान ऐसे खुल गये जैसे कि लेडीज ब्यूटी-पार्लर और जिम जहाँ युवा पीढी़ अपनी जेब खाली करके बेहतर भविष्य के सपने देख सकें।

विश्व में भारत एमबीए व प्रबंधशिक्षा का सबसे बडा़ बाजार है क्योंकि दुनिया के एक तिहाई से ज्यादा बिजनिस स्कूल भारत में पाये जाते हैं। पिछले 5 वर्षों में लाखो भारतीय युवाओं के एमबीए करने के सपने चूर होते देखे गये क्योंकि उन्हें मोटी फीस देने के बाद डिग्रियां तो मिलीं किन्तु किसी अच्छी कंपनी में नौकरी पाना उनके लिये एक दुस्वप्न रहा । इनमें से बहुत से युवाओं को छोटी-मोटी नौकरी से गुजारा करना पड़ रहा है या वे पारिवारिक धंधे में हाथ बंटा रहे हैं। आज भारत सरकार, यू.जी.सी. एवं एआईसीटीई से यह सवाल पूछा जाना चाहिये कि क्या उनके पास एमबीए डिग्रीधारियो की वर्तमान और भावी मांग के लिये कोई तथ्यपरक एवं विश्वसनीय आंकडे़ हैं या नहीं। क्या उच्चशिक्षा में नये संस्थान, कालेज व यूनिवर्सिटियां खोलते समय में यह ध्यान में रखा जायेगा कि भविष्य में एमबीए, इंजीनियरिगं, फार्मेसी, मेडीकल व डेण्टल शिक्षा के कोर्सों की मांग व पूर्ति मेें संतुलन बना रहे? यह कार्य अगर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय, यूजीसी, एआईसीटीई, एमसीआई, डीसीआई, आदि नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या एमबीए की चमक फीकी हो रही है और क्या भविष्य में एमबीए की डिग्री वाले युवाओं को अच्छी नौकरियाँ नहीं मिल पायेंगी? एमबीए डिग्रीधारियों को भर्ती करने वाली कंपनियांे एवं उनके उच्च प्रबंध की कई बार यह शिकायत रहती है कि भारतीय बिजनिस स्कूलों से निकलने वाले एमबीए डिग्रीधारी आज की व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करने और कंपनियों के कारोबार की दिन भी प्रतिदिन की समस्याओं का हल ढंूढने में असमर्थ हैं। राष्टीय स्तर पर किये गये कई सवक्षणों में भी यह उभर कर आया हैं कि बमुश्किल 23 प्रतिशत एमबीए ही कम्पनियों में भर्ती किये जाने योग्य है। स्पष्ट है कि सिर्फ एमबीए की डिग्री औद्योगिक व व्यावसायिक जगत में सफलता की गारण्टी नहीं है।

एमबीए एक अन्तर्राष्ट्रीय डिग्री है जिसका विश्वस्तरीय बाजार है। अक्सर एमबीए की उपादेयता एवं उसकी रोजगारपरकता पर सर्वेक्षण किये जाते हैं। अभी हाल ही में एमबीए की विश्वस्तरीय प्रवेश परीक्षा जीमेट संचालित करने वाली संस्था जीमेक ने विश्वव्यापी स्तर पर एक सर्वेक्षण किया। 50 देशों की 935 कंपनियों में एमबीए डिग्रीधारियों को भर्ती करने वाले प्रबंधकों से यह पूछा गया कि आने वाले वर्ष में एमबीए डिग्रीधारियों को वे अपनी कंपनियों में भर्ती करेंगे या नहीं। 75 प्रतिशत कंपनियों ने यह बताया कि उन्हें एमबीए भर्ती करने हैं। इन कंपनियों की एमबीए भर्ती करने की मांग भी बढ़ती हुई देखी गई। 33 प्रतिशत बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब अपने देश के बजाय दूसरे देशों के एमबीए भर्ती करना चाहती हैं। यूएसए की कंपनियों ने एमबीए की औसत तनख्वाह 90,000 डालर से 95,000 डालर बढ़ने के संकेत दिये हैं। जीमेक सर्वेक्षण में भाग लेने वाली कंपनियां सिर्फ ऐसे संस्थानों में जाना चाहती है जहां प्रवेश से पूर्व कार्य अनुभव वाले विद्यार्थी ज्यादा हों और वे प्रवेश लेते ही कैम्पस की शिक्षणेतर गतिविधियों के माध्यम से कंपनियों से सम्पर्क बनाने में सिद्धहस्त हों।

हर भारतीय अभिभावक और उनकी युवापीढ़ी के मन में यह सवाल उठते हैं कि एमबीए करने से क्या फायदा होगा? क्या एमबीए की पढ़ाई पर जितना खर्च होगा, उतना कितने साल की नौकरी से वसूल हो पायेगा? क्या एमबीए करने के बाद सबको नौकरी मिल पायेगी? क्या स्नातक डिग्री पानेे के बाद सीधे एमबीए करना चाहिये या कुछ वर्ष कार्य-अनुभव पाने के बाद? एडमिशन लेने से पूर्व इन सवालों के जवाब लेना जरूरी है। यह तय है कि एमबीए पिछले 50 वर्षो में दुनियाभर में सर्वाधिक लोकप्रिय पाठ्यक्रम रहा है और आने वाले दशकों में भी इसकी चमक कायम रहेगी। भारत के संदर्भ मेें यह ध्यान रखना होगा कि हर पीली और चमकदार धातु सोना नहीं होती तथा किसी चालू मार्का प्रबंध संस्थान से एमबीए करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। हम सभी को एमबीए की मृग मरीचिका से बचना चाहिये।