यूं तो मथुरा की पहचान धार्मिक नगरी से है, लेकिन बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता एवं वामपंथी वैचारिक जगत में इस शहर को इसलिये भी प्रसिद्धि मिली क्यों कि हिन्दी साहित्य की एक बड़ी हस्ती यहां रहती थी । इस हस्ती का नाम था प्रो॰एस॰एल॰ वशिष्ठ जो कि स्थानीय बी॰ एस॰ ए॰ कालेज में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष थे । रिटायरमेंट के बाद वे ब्रेन कैंसर सेे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये और 17 दिसंबर, 1997 को उनका निधन हो गया ।

खुर्जा के मूल निवासी प्रो॰ वशिष्ठ साठ के दशक में मथुरा में आकर बस गये थे । डैम्पियर नगर में म॰ नं॰ 2164 में वे एक कोठरी में किरायेदार के रूप में रहते थे । इस कोठरी में एक खाट, दो-तीन कुर्सियां और कुछ किताबों के अलावा कोई और चीज दिखाई नही देती थी । इसी कोठरी में रहकर सव्यसाची ने उत्तरार्द्ध और उत्तरगाथा जैसी साहित्यिक पत्रिकाएं निकाली, जिनका पाठक वर्ग समूची हिन्दी पटटी में फैला हुआ था। राहुल संाकृत्यायन की वैचारिक पुस्तिकाओं ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘दिमागी गुलामी’ की तर्ज पर सव्यसाची ने अपना वैचारिक साहित्य लिखा। उनकी दर्जनों पुस्तिकाओं में ‘नौजवानो से’ काफी मशहूर हुईंु और उसकी लाखों प्रतियां प्रकाशित हुईु। वे शुरू में कविताएं लिखते थे और उनका पहला कविता संग्रह ‘अंधेरे के खिलाफ’ नाम से प्रकाशित हुआ ।

हिन्दी के प्रगतिशील और जनवादी साहित्य में स्व॰ सव्यसाची को एक सम्पादक, प्रकाशक, वक्ता एवं संगठनकर्ता के रूप में अच्छी खासी प्रसिद्धि मिली । जब 1974 में जनवादी लेखक संघ की स्थापना हुई तो उसके प्रमुख नेताओं में सव्यसाची थे । साठवें तथा सत्तर के दशक में हिन्दी में लघु पत्रिका आंदोलन बहुत लोकप्रिय था और उस दौर में उत्तरार्द्ध पत्रिका को लोग बहुत चाव से पढ़ते थे । हिन्दी के अनेक प्रसिद्ध साहिसकार मथुरा आने, भाषण देने या कविता पाठ के लिये तुरन्त तैयार हो जाते थे क्यों कि मथुरा में सव्यसाची से मिलने की उन्हें उत्कंष्ठा रहती थी । हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखकों में नागार्जुन, त्रिलोचन, भैरवप्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय भीष्म साहनी, चन्द्रबली सिंह, शेखर जोशी, काशीनाथ सिहं और केदार नाथ अग्रवाल का स्व॰ सव्यसाची से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा ।

स्व॰ सव्यसाची की एक खासियत थी कि वे युवा रचनाकारों एवं छात्र नेताओ को बहुत मदद करते थे एवं उनका मार्गदर्शन करते थे । मथुरा शहर से निकले कई प्रतिभाशाली रचनाकारो, लेखकों और युवा नेताओं को आज सारा देश जानता है । उनकी प्रतिभा को सव्यसाची ने एक कुशल मूर्तिकार की तरह तराशा था। हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो॰ सुधीश पचैरी (सह-कुलपति,दिल्ली विश्वविद्यालय) प्रसिद्ध कवि प्रो॰ मनमोहन (रोहतक विश्वविद्यालय) हास्य कवि प्रो॰ अशोक चवुघर (उपाध्यक्ष, हिन्दी संस्थान) आलोचक डा॰ भरत सिहं (ए॰ एम॰ यू॰) एवं प्रो॰ जगदीश्वर चतुर्वेदी (कलकत्ता विश्वाविद्यलय), युवा पत्रकार श्री पंकज पचैरी एवं श्री विपुल मुदगल, जस्टिस भारत भूषण तथा मैं स्वयं उनके व्यक्तित्व से युवावस्था में बहुत प्रभावित रहे । आपातकाल के दौरान 1976 में मथुरा शहर के युवा संस्कृतिकर्मियों ,लेखकों और सामाजिक कायकितओिं ने सव्यसाची जी के विचारों से प्रेरित जन संास्कृतिक मंच की स्थापना की थी जिसने थियेटर, लायब्रेरी, साहित्य, समाज- कार्य व फिल्मों के माध्यम से समूचे ब्रज क्षेत्र में सांस्कृतिक नवजागरण को जन्म दिया था ।

सारा हिन्दी जगत जिनकी कल्पना एक महान साहित्यकार एवं विचारक के रूप में करता था, वे स्वयं सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे । वे खादी के फटे कुर्ते पायजामे पहनकर साईुकल पर हर रोज पूरे शहर की परिक्रमा लगाते थे । उनके बारे में किवदंती थी िकवे अपना वेतन गरीब छात्रों, में बाट देते हैं और ब्लेड से अपने कुर्ते पायजामे को फाड़कर सादगी का दिखावा करते है ।

स्व॰ सव्यसाची को मथुरा में हजारो लोग अपना दोस्त , मार्गदर्शक, परिवारीजन और मसीहा समझते थे । गोकुल रैस्टोरंेट, डैम्पियर में वे दोपहर का खाना खाते थे और रात का डिनर अक्सर अपने मित्र प्रो॰ रामप्रसाद कमल के घर पर करते थे । रात को घर लौटने से पहले होली गेट पर पहलवान हलवाई के यहां कुल्हड़ वाले मलाईदार दूध को पीना उनका शौक था । उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विजय लक्ष्मी राधानगर मथुरा में एक स्कूल चलाती है । और उनके दो पुत्र अभी पढ़ाई कर रहे है।

हिन्दी में नवजागरण के अग्रदूत बने स्व॰ सव्यसाची को मथुरा से जुडे़ और देशभर में फैले हुए बुद्धिजीवियों, लेखकों व पत्रकारों की ओर से, मैं हार्दिक श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ।