दुनिया ने अभी तक इन्टरनेट और गूगल सर्च को किताबों के विकल्प के रूप में पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है।
– हरिवंश चतुर्वेदी
डायरेक्टर, बिमटेक
बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा नजदीक है जिस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा के साथ पुस्तकों व कलम की भी पूजा होती है। नये वर्ष के आगमन के साथ पुस्तक मेलों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। फिलहाल दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला (6 से 14 जनवरी) चल रहा है। अगले दो-तीन महिनों में कलकत्ता, मुंबई, बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद, पटना और भुवनेश्वर जैसे महानगरों में होने वाले पुस्तक मेलों में भीड़-भाड़ दिखायी देगी।
पुस्तक मेलों के साथ-साथ अब एक और मेला बहुत लोकप्रिय हो रहा है वह है ‘लिटरेचर फैस्टीवल’। 24 से 29 जनवरी, 2018 तक होने वाले जयपुर लिटरेचर फैस्टीवल (जे.एल.एफ.) में देश-विदेश के मशहूर लेखक और लाखों दर्शक भाग लेंगे। जे.एल.एफ. की लोकप्रियता को देखकर अब लिटरेचर फैस्टीवल सभी प्रमुख महानगरों में होने लगे हैं जिनमें युवा वर्ग की अच्छी खासी भीड़ देखी जाती है। इस भीड़ को देखकर आप को लगेगा कि भारतीय युवाओं पर अब किताबों और साहित्य के प्रति दीवानगी बढ़ रही है। लेकिन किताबों और साहित्य के लिये युवाओं में बढ़ता हुआ यह रूझान क्या महानगरों के उच्च मध्यवर्गीय अंग्रेजी जानने वाले युवाओं तक ही सीमित है या फिर भारतीय भाषाओं में किताबें पढ़ने वाले युवाओं में भी फैल पाया है?
भारतीय युवाओं में किताबें पढ़ने की आदत घट रही है या बढ़ रही है, इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह जानना जरूरी होगा कि आखिर वे युवा अपने फुर्सत के समय में क्या करते हैं? भारत में 13 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं की आबादी करीब 47 करोड़ है जिसमें 34 करोड़ साक्षर हैं।
इन युवाओं की दिनचर्या को गौर से देखा जाये तो पायेंगे कि बेरोजगारी के कारण ज्यादातर युवा ‘टाइमपास’ करने में लगे पाये जाते हैं। कुछ लोग गांव, कस्बों और शहरों की खाली पड़ी हुई जगहों में क्रिकेट, फुटबॉल या कबड्डी खेलते हुए दिखेंगे। बड़ी संख्या में बेरोजगार युवाओं को सड़कों, बाजारों और चौराहों पर टाइमपास करते हुए देखा जा सकता है। इन में से एक बड़ा वर्ग मोबाईल पर बातचीत करते हुए भी दिखेगा। चाय और पान की दुकानों पर अक्सर युवाओं के झुण्ड मिलेंगे जो गप्पबाजी में व्यस्त होते हैं। बहुत कम ऐसे नौजवान मिलेंगे जिनके हाथ में कोई किताब, मैगजीन या अखबार हो और वे उसे पढ़ रहे हों।
पिछले 25 वर्षों में हमारे देश में जो तेज आर्थिक बदलाव आए हैं, उसने हमारी समूची सामाचिक संरचना व सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया है। छोटे-बड़े शहरों में
मॉल-संस्कृति का विस्तार हुआ है। मल्टीप्लेक्स और रेस्टोरेंट तो बढ़ते गए, किंतु पब्लिक लाईब्रेरियां कम होती चली गई। किताबें बेचने वाली दुकानें और बाजार बंद होते देखे गए, किंतु संपन्न वर्ग की पसंदीदा अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन व्यवसाय में तेजी आई है। भारतीय समाज के इस संक्रमण व्काल में चिंता का एक प्रमुख विषय है- युवाओं में पुस्तक पढ़ने की आदत का लगातार कम होते जाना। आज अंग्रेजी में मध्यवर्गीय पाठकों के पसंदीदा विषयों पर लिखने वाले चेतन भगत जैसे लेखकों की किताबों की लाखों प्रतियां बिक जाती हैं, पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बडे़ लेखकों के उपन्यास या कहानी संग्रह हजार-दो हजार ही छपते हैं।
भारतीय युवाओं में किताबें पढ़ने की आदत क्यों कम होती जा रही है? इस मसले पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। हमें यह जानना होग कि युवाओं में किस तरह की किताबें अधिक लोकप्रिय होती हैं और वे हफ्ते में या दिन में कितनी देर किताबें पढ़ते हैं? किन विषयों पर लिखी गई किताबें उन्हें रूचिकर लगती हैं? उन्हें किताबें पढ़ने के लिए कौन लोग प्रेरित करते हैं? इन मुद्दों पर भारत में ज्यादा अनुसंधान नहीं हुआ है इसलिए आंकड़े बहुत कम उपलब्ध हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट ने इन सभी मुद्दों पर नेशनल यूथ रीडरशिप सर्वेक्षण (एनवाईआरएस) करने का काम वर्ष 2009 में एनसीएईआर को सौंपा था। इस सर्वेक्षण को देश के 207 जिलों के 432 गांवों और 199 शहरों के 753 नगरीय वार्डो में संचालित किया गया था और 38,575 युवाओं के इन्टरव्यू लिये गये थे।
इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट में युवाओं में किताब पढ़ने की आदत के कम होते जाने से संबंधित कई महत्वपूर्ण तथ्य उद्द्याटित हुए हैं। सर्वेक्षण के समय, साक्षर युवाओं में सिर्फ 25 प्रतिशत ही किताब पढ़ने के शौकीन पाए गए। भौगोलिक और धार्मिक आधार पर भी पढ़ने की आदत में काफी फर्क पाया गया। साक्षर युवाओं में दक्षिण भारत के 24 प्रतिशत, पश्चिमी व पूर्वी भारत के 22 प्रतिशत, मध्य भारत के 12 प्रतिशत और उत्तर भारत के सिर्फ 13 प्रतिशत किताबें पढ़ने का शौक रखते थे।
जिन युवाओं में पुस्तक पढ़ने का शौक है, वे आखिर क्या पढ़ते हैं? यह सवाल भी पूछा गया था। 42 प्रतिशत युवा हास्य-व्यंग्य और साहित्यिक रचनाएं पढ़ने के शौकीन हैं। पुस्तक प्रेमियों को यह शौक ज्यादातर अपने स्कूलों, अभिभावकों या शिक्षकों से मिलता हुआ देखा गया। सिर्फ 12 प्रतिशत साक्षर युवा उपहार लेने या देने के लिए किताबों का उपयोग करते हैं। भारतीय युवाओं में पुस्तकों से विरक्ति या अरूचि क्यों है? सर्वेक्षण में पाया गया कि अरूचि के चार खास कारण हैं- ‘पढ़ने में दिलचस्पी न होना, समय न होना, सूचना के नए श्रोत मिलना और वाजिब कीमत पर किताबें उपलब्ध न होना।’
नौजवानों में किताबें पढ़ने के शौक के कम होने के पीछे एक प्रमुख कारण देश में पब्लिक लाईब्रेरियों की मौजूदा खस्ता हालत भी है। आजादी के बाद जिला, तहसील, तालुका और गांव के स्तर पर सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित हुए थे, जो स्थानीय स्तर पर बौद्धिकता, रचनात्मक लेखन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण व युवा-पीढ़ी के निर्माण का केन्द्र बनते देखे गए।
अगर देश के प्रसिद्ध नेताओं, वैज्ञानिकों, लेखकों, शिक्षाविदों और प्रशासकों की जीवनीयों को पढ़ा जाये, तो इनमें से अधिकाश सुबह-शाम इन लाइब्रेरियों में बैठकर अपना वक्त गुजारा करते थे। आज अधिकांश लायब्रेरियों की इमारतें जर्जर हो चुकी हैं, किताबें बहुत पुरानी और अपठनीय हो गई हैं और लाइब्रेरी स्टाफ को जिंदा रहने लायक वेतन ही मिल पाता है।
युवा पीढ़ी के लोग यह तर्क रख सकते हैं कि उनके पास स्मार्ट फोन और कम्पयूटर हैं और वे इन्टरनैट ओर गूगल सर्च का इस्तेमाल करके कोई भी सूचना प्राप्त कर सकते है। इसलिये अब उन्हें लायब्रेरियों में जाने और किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है। किसी सीमा तक उनके तर्क में दम है किन्तु दुनिया ने अभी तक इन्टरनैट और गूगल सर्च को किताबों के विकल्प के रूप में पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। भारत के संदर्भ में तो यह कतई नहीं माना जा सकता कि बिना किताबों को पढ़े हुए युवा पीढ़ी अपने भविष्य का निर्माण कर सकती है।
सबसे अहम सवाल है कि जिस युवा पीढ़ी के पास किताबों से टक्कर लेने वाले सूचनाओं के अनेक स्त्रोत हैं, उस को किताबों को पढ़ने के लिसे कैसे प्रेरित किया जा सकता है? इस सवाल का हल ढूंढने के लिये सरकारों, स्कूलों और परिवारों को अपनी जिम्मेदारी निभानी पढ़ेगी। 1957 में नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) की स्थापना इसी काम के लिये की गई थी। यह कहना कठिन होगा कि विगत 60 वर्षों में एनबीटी अपने मिशन में कितना कामयाब हुआ है। स्कूलों में लायब्रेरी ओर किताबें तो है किन्तु उन्हें पढ़ने की आदत को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अभिभावक भी प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग पर ज्यादा ध्यान देते हैं। वे अपने बच्चों को मंहगे स्मार्ट फोन तो खरीदकर दे सकते हैं, किन्तु बच्चों के लिये किताबें खरीद कर लाना उनकी आदतों में शुमार नहीं होता।
युवा पीढ़ी में किताबों को पढ़ने की आदत को लोकप्रिय बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका केन्द्र व राज्य सरकारों की है जिसमें ज्यादातर सरकारें असफल रही हैं। अपवाद के रूप में महाराष्ट्र और तामिलनाडु की राज्य सरकारों का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने कानून बनाकर जिला, तहसील और तालुका स्तर पर पब्लिक लायब्रेरियां संचालित करने की जिम्मेदारी कानूनी तौर पर अपने ऊपर ली है। नतीजतन शिक्षा के क्षेत्र में इन दो राज्यों की उपलब्धियां राष्ट्रीय औसत से कहीं ऊपर रही हैं। इस क्षेत्र में काम कर रही स्वयसेवी संस्थाओं को भी भरपूर वित्तीय मदद देने की जरूरत हैं क्योंकि उन को आगे लाये बिना भी एक राष्ट्रव्यापी पुस्तकालय आंदोलन खड़ा करना मुश्किल होगा। केरल में केरल शास्त्र साहित्य परिषद (केएसएसपी) ने गांव-गांव पुस्तकालय खोलकर ग्रामीण युवाओं और बच्चों को पुस्तक प्रेमी बनाने में सराहनीय काम किया है।