रामकथा मर्यादा पुरूषोत्तम राम के संघर्षपूर्ण जीवन का सजीव वर्णन होने के साथ-साथ समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक आधार भी है। वाल्मीकि रामायण और रामचरित माानस से लेकर महाकवि निराला कृत ‘‘राम की शक्ति पूजा’’ तक सैकड़ो महाकाव्य, खण्डकाव्य, नाटक, उपन्यास लिखे गये। इन सभी में भगवान राम के चरित्र के रूप में एक ऐसे महानायक का चित्रण हुआ है जिसने हजारों वर्षाे से समूची मानव जाति को सच्चाई, धर्म, मानवता, और परहित पर चलने का उपदेश दिया है।

मुझे अपने विद्यार्थी जीवन में अपने पिता श्री रघुनाथ प्रसाद चतुर्वेदी से लगातार यह शिक्षा मिली कि रामकथा पढ़ने से मानव जीवन की हर सच्चाई और व्यावहारिकता का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ने से मुझे यह ज्ञान हुआ कि राष्ट्रपिता पर रामचरित मानस का कितना असर था। स्वं पं0 राम किंकर, राष्ट्र संत मुरारी बापू और प्रो0 पी0 एन0 मिश्र (इंदौर) के प्रवचनों में मुझे जब रामकथा के प्रबंध सूत्रों का ज्ञान हुआ, तो मुझे यह लगा कि प्राचीन भारत की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म, विज्ञान, दर्शन, कला के साथ-साथ प्रबंधशास्त्र में भी कितनी सिद्धहस्त थी।

आजकल दुनिया में एम.बी.ए. शिक्षा की धूम मची हुई है क्योंकि किसी भी ख्याति प्राप्त संस्थान से इस उपाधि को लेकर करके कोई भी व्यक्ति कारपोरेट जगत में सफलता के सोपानों पर चढ़ सकता है। प्रबंधशास्त्र कई विषयों के व्यावसायिक जगत में उपयोग से जनित एक पेशेवर विद्या है। किन्तु यह मानविकी, समाज
विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञानों से कई मायनों में भिन्न है। इसमें प्रबंध के सैद्धान्तिक अध्ययन के साथ-साथ उवके व्यावहारिक प्रयोग और अनुभव पर भी जोर दिया जाता है। आजकल प्रबंध मंे जिन खास विषयों पर जोर दिया जाता है वे हैं- नेतृत्व, उद्यमिता, नवाचार, विविधता, नैतिकता, सामाजिक जवाबदेही आदि। सन् 2008 की मंदी के दौरान दुनिया के अनेक देशों में जो संकट पैदा हुआ, उसमें बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां धराशयी हो गई। इसका मूलाकारण था उच्च प्रबंध या सी.ई.ओ. की स्वार्थपरिता और मूल्यविहीनता। आज सारी दुनिया कें प्रबंध संस्थानों में चर्चा का मुख्य विषय है कि कम्पनियों के नेतृत्व या उच्च प्रबंध को समाज, मानवता और समूची सृष्टि के प्रति कैसे जवाबदेह और संवेदनशील बनाया जाये।

यूं तो राम कथा का समूचा प्रसंग और संदर्भ आधुनिक कारपोरेट प्रबंध से सर्वदा भिन्न है, किन्तु उसमें आधुनिक प्रबंध के लिये बहुत उपयोगी अनेक मूल्यवान शिक्षाएं और दार्शनिक मूल्य छुपे हुए हैं। हाँ, पाठक को थोड़ी गहराई में जाना होगा।
राम कथा में नेतृत्व, प्रबंध, संगठन, अभिप्रेरणा, संचार और राजधर्म के दो सर्वथा विपरीत माॅडलों की चर्चा की गई है। एक माॅडल मर्यादा पुरोषत्तम राम का है जो सत्य, करूणा, शील, त्याग और परहित पर आधारित है। इसके विपरीत दूसरा माॅडल लंकापति रावण का है जो कि अहंकार, असत्य, स्वार्थ, लालच जैसे नकारात्मक मूल्यों पर आधारित है। भगवान राम और रावण की सेनाओं के बीच का संघर्ष, समूची मानवता में हजारों वर्षो से चली आ रही अच्छाई और बुराई के बीच की सनातन लड़ाई का महाकाव्यात्मक बिंब भी है।

रावण प्रकांड पंडित और बलशाली होते हुए भी नेतृत्व और प्रबंधन में भय, अहंकार, ईष्या, घृणा जैसे नकारात्मक मूल्यों का उपयोग करता है। अपने भाई विभीषण के प्रति उसका दुव्र्यवहार इसका एक उदाहरण है। रावण के चरित्र में पाये जाना वाला हठ, घमण्ड़ और स्वार्थपरिता एक अच्छे राजा, नायक और नेता का परिचायक नहीं है। इसके विपरीत भगवान राम की नेतृत्व शैली में सत्य, शील, करूणा, सहयोग जैसे सकारात्मक मूल्यों का पग-पग पर उपयोग दिखाई देता है।

नायक, नेता या सी.ई.ओ. कैसा होना चाहिये, इसके लिये गोस्वामी तुलसीदास ने शरीर में मुख के साथ उसकी तुलना करते हुए कहा है-
मुखिआ मुखु सो चाहिये, खान-पान कहुं एक।
पालइ पोषई सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक।।
शरीर में जैसे भोजन को मुख गृहण करता है किन्तु वह शरीर के सभी अंगो को पोषाहार प्रदान करता है। वैसे ही नेता को संगठन के सभी सदस्यों का पोषण सदैव करना चाहियें, सिर्फ अपने निजी स्वार्थो पर ही ध्यान नहीं देना चाहिये।

आधुनिक नेतृत्व और प्रबंध में आजकल मूल्यों पर आधारित प्रबंधन पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है क्योंकि संगठन के स्थायित्व और सामाजिक उत्तर दायित्व के लिये यह अपरिहार्य हैं। रावण से युद्ध करते समय विभीषण और राम के बीच का एक प्रसंग बहुत ही मूल्यवान है। इस प्रसंग में भगवान राम अपनी नेतृत्व शैली पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि किस प्रकार नेता की आंतरिक शक्ति और मनोबल बाहरी शक्ति, शस्त्रों और संसाधनों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।

राम-रावण के निर्णयात्मक युद्ध से पूर्व विभीषण को लगता है कि रावण रथ, कवच, शस्त्रों आदि से सुसज्जित है जबकि राम के पास ये सब नहीं हैं। विभीषण कहता है-
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा, देख बिभीषण भयउ अधीरा।
भगवान राम जो अपनी आंतरिक शक्तियों और अपनी विजय पर आश्वस्त हैं, विभीषण को बताते हैं कि जो रथ विजय दिलाता है वह कैसा होता हैंः-
सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्यसील दृढ ध्वजा पताका।
बल बिबेक दम पर हित घोरे, छमा कृपा समता रजु जोरे।।
अर्थात विजय दिलाने वाले रथ में शौर्य और धैर्य दोनो पहिये आवश्यक है। एक पहिये से काम नहीं चलता। उस रथ की सत्य और शील ध्वजा व पताका हैं। सत्य अचल व अपरिवर्तनीय है तथा शील परिस्थिति जन्य है।