हरिवंश चतुर्वेदी
डायरेक्टर, बिमटैक
डोनाल्ड ट्रम्प के अमरीका का राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी आव्रजन से जुड़ी अनेक घोषणाओं और उनसे पैदा होने वाले सामाजिक अलगाव का असर विश्व के हर कोने से उच्च शिक्षा के लिये आने वाले छात्रों की संख्या पर पड़ा है। पर्यटन के बाद उच्च शिक्षा अमरीका की आमदनी का बड़ा स्रोत है। वहां उच्च शिक्षा ले रहे 11 लाख विदेशी छात्र खरबों डालर खर्च करते है जो कि अमरीकी अर्थव्यवस्था की सेहत को बढ़ाता है।
किन्तु अभी हाल ही में प्रकाशित हुए आंकड़े यह बताते हैं कि दुनिया भर में छाया हुआ अमरीकी उच्च शिक्षा का जादू अब कम हो रहा है और कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, यूके जैसे पश्चिमी देश उसके प्रबल प्रतिद्वन्द्वी के रूप में उभर रहे है। इन्स्टीट्रयूट ऑफ इन्टरनेशनल एजूकेशन द्वारा जारी की गई रपट ओपन डोर के अनुसार वर्ष 2016-17 में अमरीका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की संख्या सिर्फ 12.3 प्रतिशत बढी जो कि पिछले 3 वर्षों में सबसे कम वृद्धि आंकी गई है। वर्ष 2015-16 और 2014-15 में यह वृद्धि क्रमशः 24.9 प्रतिशत और 29.4 प्रतिशत रही थी।
आंकडे़ यह बताते है कि फिलहाल अमरीका में पढ़ रहे भारतीय विद्यार्थियों की संख्या 1.86 लाख है जो वहां पढ़ रहे कुल विदेशी विद्यार्थियों का 17.3 प्रतिशत है। इन भारतीय विद्यार्थियों से अमरीकी अर्थव्यवस्था को 2017 में रू. 44000 करोड़ की आमदनी हुई। हर साल अमरीका जाने वाले भारतीय पर्यटक भी करीब रू. 80,000 करोड वहां खर्च करते है। अगर अमरीकी अर्थव्यवस्था को भारत से होनवाली यह कमाई कम होती है तो राष्ट्रपति डोनाल्ड का चिंतित होना स्वाभविक होगा क्यों कि भारत औरं अमरीका के आपसी व्यापार में अमरीका को करीब रू. 1.30 लाख करोड़ का घाटा होता है।
डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी आव्रजन संबन्धी अनेक घोषणओं का असर दुनिया भर से उच्चशिक्षा के लिये आने विद्यार्थियों की संख्या पर पड़ा है। आप अगर अमरीका के किसी भी ख्यातिनामा विश्वविद्यालय या कालेज मे जाये तो वहां हर जगह एक मिनी-विश्व दिखाई देगा जो कि अमरीकी उच्चशिक्षा की एक बड़ी अच्छाई मानी जाती रही है। किन्तु अब अमरीकी विश्वविद्यालयों के कुलपति, रैक्टर और प्रेसीडेन्ट चिंतित है कि विदेशी विद्यार्थी अगर घटते जायेंगे तो उनकी वित्तीय स्थति पर इसका बुरा असर पड़ेगा।
अमरीका जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों की संख्या ही कम नहीं हो रही, बल्कि वहां पढ़ रहे कुल विदेशी विद्यार्थियों की संख्याओं मे एक तिहाई योगदान देने वाले चीनी विद्यार्थी भी कम हो रहे है। वर्ष 2016-17 मे चीनी विद्यार्थियों की संख्या सिर्फ 6.8 प्रतिशत बड़ी जो कि पिछले 11 वर्ष की सबसे कम वृद्धि थी। इस समय अमरीका मे 3.51 लाख चीनी विद्यार्थी पढते है। भारत और चीन के साथ-साथ अमरीका में अन्य देशों से आने वाले विद्यार्थी भी कम हो रहे है। मिसाल के तौर पर सऊदी अरब से आने वाले विद्यार्थी 14 प्रतिशत और ब्राजील से आने वाले विद्यार्थी 32 प्रतिशत कम हुए है।
दुनिया में पढ़ाई के लिये अपना देश छोड़ कर पश्चिम के किसी विकसित देश में जाकर दाखिला लेना कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। प्राचीन काल में भारत के नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों मे दक्षिण पूर्वी एशिया और खासतौर पर चीन से उच्चशिक्षा विद्यार्थी के लिये आते रहे है। ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे विश्वविद्यालय पिछले 6-7 सौ वर्षो से दुनिया भर से विद्यार्थियो के लिये आकर्षण का केन्द्र रहे है। किसी भी देश में उच्चशिक्षा के लिये विदेशी विद्यार्थियों क बड़ी संख्या में आना उस देश को सिर्फ वित्तीय लाभ नहीं देता वरन बौद्धिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक जगत में उसकी धाक को स्थापित करता है।
क्या अमरीका में आने वाले विदेशी विद्यार्थियों मे गिरावट को डोनाल्ड ट्रम्प की आव्रजन संबन्घी नीतियों का परिणाम ही समझा जाये या इसे एक नये दौर की शुरूआत माना जाये जिसमे बौद्धिक स्तर पर अमरीका का प्रमुख खत्म हो जायेगा और उनके अन्य पश्चिमी और एशियाई देश उसका स्थान ले लेंगे? इस गिरावट का कारण सिर्फ डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियां है या अमरीकी कैम्पसों में बढ़ रही हिंसा, बेचैनी और विद्यार्थी यो में व्यापृ नस्लीय ध्रुवीकरण भी है?
अनेक पश्चिमी और एशियाई देश अब उच्चशिक्षा में कई दशकों से चले आ रहे अमरीकी प्रभुत्व को चुनोती दे रहे है। दुनिया में करीब 50 लाख़ विद्यार्थी उच्चशिक्षा के लिये विदेश जाते है। ये वे उन अभिजात्य परिवारों से आते है जो समृद्ध और प्रबुद्ध है। विदेशी शिक्षा और डिग्री आज दुनिया में एक गौरव-प्रतीक है। कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन, आयरलैड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड जैसे देशों की सरकारें अपनी उच्च शिक्षा की गुणवता को विश्वस्तर पर प्रचारित करती रही है। पिछले कुछ दशकों से चीन, हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया और यूएई भी इस में आगे आ रहे है।
डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के फलस्वरूप भारतीय विद्यार्थियों के अमरीका गमन में हो रही गिरावट का फायदा अब कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों को मिल रहा है। वर्ष 2015 में 32 हजार भारतीय विद्यार्थी कनाडा गये जिनकी संख्या वर्ष 2016 में 53 हजार हो गई थी। वर्ष 2016 में 11 हजार भारतीय विद्यार्थी यू॰ के॰ और 14 हजार जर्मनी गये थे। जर्मनी जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों की संख्या हर साल 15-20 प्रतिशत बढ़ रही है। योरोपीय देशों की तरफ भारतीय विद्यार्थियों का झुकाव तेजी से बढ़ रहा है। योरोपीय यूनियन में अभी करीब 45 हजार भारतीय विद्यार्थी पढ रहे है। अमरीका की तुलना मे ई॰ यू॰ की बढती हुई लोकप्रियता का प्रमुख कारण अंग्रेजी माध्यम के कोर्से की उपलब्धता फीस का कम होना स्कॉलरशिप मिलना और पढाई के बाद रोजगार की अनुमति होना है।
भारतीय विद्यार्थियों के एक बड़े वर्ग का विदेश गमन जहां एक ओर अर्न्तराष्ट्रीय बौद्विक जगत में प्रतिस्पर्द्धा के लिये उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है वहां दूसरी ओर उस हताशा का भी परिचायक है जो भारत में विश्वस्तरीय उच्चशिक्षा की मांग और पूर्ति में बढ़ते हुए अंतर से पैदा हो रही है। आर्थिक उदरीकरनण के बाद मध्यवर्ग की आबादी में तेजी से विस्तार हुआ है जो कि 10 करोड़ से 20 करोड़ के बीच अनुमानित की जाती है। 1991 के बाद के दौर में करोड़ो गरीब परिवार भी मध्यवर्ग की कतारों में शामिल हुए है। इन सभी को अब अच्छी शिक्षा और अच्छी चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत है। भारतीय लोकतंत्र की तमाम विफलताओं के बावजुद उसकी एक बड़ी कामयाबी है करोडा़े परिवारों को यह उम्मीद जगाना कि बच्चों की अच्छी पढाई-लिखाई करके वे उनके भविष्य को बदल सकते है।
ल्ेकिन क्या हर मध्यवर्गीय युवा विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा के लिये विदेश जा सकता है? यह निश्चित रूप से असंभव है। क्या हम हर प्रतिभाशाली भारतीय युवा को उच्च स्तरीय विश्वविद्यालयों और कालेजों में प्रवेश दे पा रहे है? आंकड़े ये बताते है कि भारत की उच्चशिक्षा एक पिरामिड की तरह है जहां विश्वस्तरीय शिक्षा देने वाले संस्थान गिने- चुने है और रोजगार परक अच्छी क्वालिटी की शिक्षा देने वाले संस्थान भी बहुत कम विद्यार्थियों के दाखिला दे पाते है। पिछले 3 दशकों में उच्च शिक्षा में जो भी विकास हुआ है वह मात्रात्मक अधिक और गुणात्मक रूप से बहुत कम हुआ है। आकार और संख्यात्मक दृष्टि से भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था चीन के बाद दूसरे नंबर पर आती है। वर्तमान में भारत के 878 विश्वविद्यालयों और 40,750 कालेजों में 3.5 करोड से अधिक विद्यार्थी पढ़ते है। करीब 8.5 लाख प्राध्यापकों के ऊपर ये जिम्मेदारी है कि वे देश के भविष्य के लिये नयी पीढ़ी को पढ़ा लिखा कर तैयार करें। किन्तु भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था वर्तमान में गंभीर दिशाहीनता, वित्तीय संकट, अराजकता और गुटबन्दी का शिकार है। 6़0-70 वर्ष पूर्व जो विश्वविद्यालय और कालेज शीर्ष पर थे आज उनको भी दुर्दिन देखने पड़ रहे है। उच्च शिक्षा की एक दर्जन नियामक संस्था भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। यूजीसी और एआईसीटीई पर यह जिम्मेदारी है कि अपने पुरानयें एंव पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़ कर उच्च शिक्षा के नियमन का एक नया मॉडल विकसित करें जो कि भारत की उच्च शिक्षा को आने वाले दशक में विश्वस्तरीय बना सके। केन्द्र व राज्य सरकारों को भी उच्चशिक्षा पर अधिक खर्च कराना होगा । वित्तीय वर्ष 2016-17 के केन्द्रीय बजट मे उच्चशिक्षा पर रू. 29703 करोड़ का प्रावघान किया गया था जो कि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। भारत को अगर विश्व गुरू बनना है तो उच्चशिक्षा में अच्छे गुरू रखने होंगे और उन्हे पढ़ाने के लिये जरूरी संसाधन भी उपलब्ध कराने होगे।