दुनियाँ की बहुचर्चित कंपनी एपल के भविष्यदृष्टा संस्थापक स्टीव जाॅब्स का 56 वर्ष की आयु में असामयिक निधन होने से सूचना क्रान्ति के एक कालखण्ड का अंत हो गया। वर्ष 2004 में अंतड़ियों में कैंसर होने के बाद स्टीव जाॅब्स लगातार जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। वर्ष 2009 में उनका लीवर ट्रांसप्लाण्ट किया गया था और वे लम्बे समय तक अस्वस्थ रहे थे। अगस्त 2001 में स्टीव ने एपल के चयरमैन पद से त्यागपत्र देकर टिम कुक को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

स्टीव के निधन पर एपल के निदेशक मण्डल का कहना है कि “स्टीव की अद्भुत प्रतिभा, जज्बा और ऊर्जा उन अनगिनत आविष्कारों की जनक थी जो आज हम सभी की जिन्दगी को समृद्ध और बेहतर बना रहे हैं। दुनिया आज स्टीव के कारण अनगिनत रूपों में लाभान्वित हुई है।“ एपल के निदेशक मण्डल के इस बयान में अतिरंजना नहीं है क्योकि आज दुनियाँ में एपल के जिन उत्पादों ने धूम मचा रखी है, उनके पीछे निस्संदेह स्टीव जाॅब्स की असाधारण प्रतिभा रही थी, जिसे कभी-कभी पागलपन भी समझा जाता था।

स्टीव के नेतृत्व में एपल ने लगातार नई ऊंचाईयों का प्राप्त किया। आज एपल ने मार्केट कैपीटलाइजेन के आधार पर अमरीका की ऐक्सोन मोबिल को भी पीछे छोड़कर दुनिया की कंपनियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लिया है। इसका श्रेय स्टीव की अद्भूत नेतृत्व क्षमता को ही दिया जाता है। उन्हें इंजीनियरिंग या किसी भी विषय में कोई डिग्री हासिल नही हुई, किन्तु उनका नाम अमरीका में 300 से अधिक पेटेन्टों के अविष्कारक या सह खोजकर्ता के रूप में दर्ज था।

स्टीव ने वर्ष 1997 और 2010 के मध्य 13 वर्षो की अवधि में पर्सनल कम्प्यूटर की प्रौद्योगिकी में लगातार नये विचार और उत्पादों का आविष्कार कर सांस्कृतिक जगत में एक रूपांतरण पैदा किया। इसने दुनिया में संगीत सुनने, बातचीत करने, फिल्में देखने और हर तरह के काम करने के तौर तरीकों में ऐसे बदलाव पैदा किये, जिनके परिणाम स्वरूप आज एपल दुनिया के युवावर्ग में नई जीवन शैली का पर्याय बन गया है।
स्टीव जाॅब्स की नेतृत्वशैली और डिजिटल इनोवेशनों पर अनेक पुस्तकें, लेख और इन्टरव्यू प्रकाशित हुए हैं। पुस्तकों में जैफ्रे यंग व विलियम साइमन की पुस्तक “आइकाॅन“, कारमाइन गैलो की पुस्तक “द प्रेजेन्टेशन सिक्रेट्स आॅफ स्टीव जाॅब्स“, जे इलियट की पुस्तक “स्टीव जाॅब्स वे“ तथा स्टीवन लेवे की “इनसेनली वे“ उल्लेखनीय हैं।

स्टीव जाॅब्स ने जिन उत्पादों का आविष्कार करके सूचना जगत में लगातार नई हलचलें पैदा की वे है-एपल कम्प्यूटर (1976-77) लीसा कम्प्यूटर (1983), आई मैक (1998) आई पौड (2001), आईट्यून स्टोर (2003) आई फोन (2007) और आई पैड (2010)। वर्ष 1985 में स्टीव को एपल कंपनी छोड़नी पड़ी थी क्योंकि उनके द्वारा नियुक्त सी0 ई0 ओ0 जाॅन स्कले से उनके गहरे मतभेद हो गये थे। एपल से अलगाव के बाद के 12 वर्षो में उन्होंने एनीमेशन की दुनियामें महत्वपूर्ण कार्य किया। स्टीव ने फिल्म निर्देशक जाॅर्ज लूकाच से एक मामूली एनीमेशन फर्म को खरीदा और कम्प्यूटर वैज्ञानिकों, कलाकारों और एनीमेटरो की एक बड़ी टीम बनाई जिसे बाद में पिक्सर एनीमेशन स्टूडियों के नाम से जाना गया। आज दुनियाँ में एनीमेशन फिल्में एक बड़ा उद्योग बन गई हैं, इसका सूत्रपात स्टीव जाॅब्स ने पिक्सर के माध्यम से किया था।

स्टीव जाॅब्स की असामायिक मृत्यु के बाद भी यह चर्चा चलती रहेगी कि उनकी असाधारण सफलता का रहस्य क्या था? स्टीव का बचपन औरों की तरह सामान्य न होकर उथल पुथल से भरा हुआ था। बिनब्याही माँ ने स्टीव को जन्म दिया था और एक मजदूर दंपति को इस शर्त पर गोद दे दिया था कि वे उसे अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्रदान करेंगे। 17 वर्ष की उम्र में अमरीका के एक मंहगे कालेज में स्टीव का दाखिला हुआ, किन्तु छः माह बाद उन्हें कालेज छोड़ना पड़ा। इसके बाद स्टीव ने बहुत संघर्ष किया। वे दोस्तों के कमरों में फर्श पर सोते थे और कोकाकोला की खाली बोतलों को बेचकर पेट भरते थे। हर रविवार को 10 किमी0 चलकर स्टीव इस्कान मंदिर में का मुफ्त वेजिटेरियन डिनर करने जाते थे। रीड कालेज में स्टीव ने कैलीग्राफी की कक्षाओं में जाकर जो सीखा उसका उपयोग उन्होंने 10 वर्ष बाद मैकिन्तोस कम्प्यूटर बनाने में किया।

स्टीव जाॅब्स के पास न तो डिग्रियां थी और न ही वे रईस मां-बाप के घर में पैदा हुए थे। स्टीव हार्डवेयर इंजीनियरिंग और सोफ्टवेयर प्रोग्रामिंग भी नहीं समझते थे। फिर ऐसा क्या था कि उन्हें डिजिटल युग में इतनी प्रसिद्धि मिली? दर असल स्टीव ने अपने आप को टैक्नो-नेतृत्व की एक ऐसी शैली में ढाला था, जो कि अपने इनोवेटिव विचारों को मूर्त रूप देने के लियें सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों की टीम बनाना जानता था। वे अपनी टीम को लगातार प्रेरित, उत्साहित और उत्तेजित करके एक आदर्श उत्पाद का विकसित करना जानते थे जिसमें उत्पाद की डिजायन पर उनका फैसला ही आखिरी माना जाता था।

स्टीव की अद्भुत प्रतिभा की एक खासियत थी कि वे हर चीज से सीखना जानते थे। 12 जून 2005 को स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के नये सत्र का शुभारंभ करते हुए उन्होंने अपने जीवन के तीन प्रसंगों की चर्चा की जिनमें अंतिम था कि उन्होंने मौत की संभावना का कैसे सामना किया। उनका कहना था कि “जब मैं 17 वर्ष का था मैंने एक उद्धरण पढ़ा था-यदि तुम हर दिन ऐसा महसूस करो कि यह तुम्हारा आखिरी दिन है, तुम एक दिन हर हालत में सही कहलाओगे।“ तब से आज तक, पिछले 33 वर्षो में हर सुबह मैंने शीशे में देखते हुए अपने आप से यही पूछा है कि यदि आज का दिन मेेरे जीवन का आखिरी दिन हो तो क्या मैं वही करूंगा जो आज मुझे करना है।“

स्टीव जाॅब्स के स्टैनफोर्ड में दिये गये भाषण का युवा विद्यार्थियों को अंतिम सुझाव था “भूखे रहिये, मूर्ख रहिये“ (स्टे हंग्री, स्टे फुलिश)। हम आज स्टीव जाॅब्स के जीवन से सीख सकते हैं कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी एक मामूली व्यक्ति दुनिया को प्रभावित कर सकता है बशर्ते वह मौत को भी अपना गुरू बना सके।